Tere hi kareeb hoon main...
My original thoughts represent
Thursday, August 13, 2020
सम्बन्धों का स्पर्श
Saturday, August 8, 2020
प्रेम दिवास्वप्न या फिर अंतहीन यात्रा
Monday, August 3, 2020
रक्षाबंधन का पावन त्योहार
यह पर्व प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण (सावन) में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी) या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्त्व है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है। राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बाँधती हैं परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बंधियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बाँधी जाती है। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है। सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
रक्षासूत्र
प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर लड़कियाँ और महिलाएँ पूजा की थाली सजाती हैं। थाली में राखी के साथ रोली या हल्दी, चावल, दीपक, मिठाई और कुछ पैसे भी होते हैं। लड़के और पुरुष तैयार होकर टीका करवाने के लिये पूजा या किसी उपयुक्त स्थान पर बैठते हैं। पहले अभीष्ट देवता की पूजा की जाती है, इसके बाद रोली या हल्दी से भाई का टीका करके चावल को टीके पर लगाया जाता है और सिर पर छिड़का जाता है, उसकी आरती उतारी जाती है, दाहिनी कलाई पर राखी बाँधी जाती है और पैसों से न्यौछावर करके उन्हें गरीबों में बाँट दिया जाता है। भारत के अनेक प्रान्तों में भाई के कान के ऊपर भोजली या भुजरियाँ लगाने की प्रथा भी है। भाई बहन को उपहार या धन देता है। इस प्रकार रक्षाबन्धन के अनुष्ठान को पूरा करने के बाद ही भोजन किया जाता है। प्रत्येक पर्व की तरह उपहारों और खाने-पीने के विशेष पकवानों का महत्त्व रक्षाबन्धन में भी होता है। आमतौर पर दोपहर का भोजन महत्त्वपूर्ण होता है और रक्षाबन्धन का अनुष्ठान पूरा होने तक बहनों द्वारा व्रत रखने की भी परम्परा है। पुरोहित तथा आचार्य सुबह-सुबह यजमानों के घर पहुँचकर उन्हें राखी बाँधते हैं और बदले में धन, वस्त्र और भोजन आदि प्राप्त करते हैं। यह पर्व भारतीय समाज में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है कि इसका सामाजिक महत्त्व तो है ही, धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फ़िल्में भी इससे अछूते नहीं हैं।
पौराणिक प्रसंग
रक्षा सूत्र बंधन का त्योहार कब शुरू हुआ, इसकी कोई सटीक जानकारी नहीं मिलती लेकिन यह पर्व है अत्यंत प्राचीन, क्योंकि इसकी प्राचीनता के प्रमाण उपलब्ध हैं। भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है। भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए निम्नलिखित स्वस्तिवाचन किया (यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है)-
येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
(श्रीशुक्लयजुर्वेदीय, माध्यन्दिन वाजसनेयिनां, ब्रम्हकर्म समुच्चय पृष्ठ -295 )
इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है-
"जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)"
Saturday, August 1, 2020
सौतेला व्यवहार....
Friday, July 31, 2020
राजस्थान सरकार संकट!
Wednesday, July 22, 2020
जब तुम्हारा मन था....
अपना क्षणिक संग था
अब तुम्हारा मन नहीं
टूटा संग जाने कहीं
मैं पहले भी चुप था
आज भी निःशब्द
फर्क साफ है
तुम आज भी
बातों से पहले
भूमिका बनाती हो
और मैं पहले की तरह
जुबान से नहीं
ह्रदय से बात करता हूूूं....
बुरा भी लगा होगा
मेरा आज का बर्ताव
पर मैं भी क्या करुं
संस्कारो की डोर से
बंधा हूँ मूल्यो की व्यवस्था में
काल्पनिक दुनिया के सब द्वार
आज तुम्हारे लिए बन्द है
कम से कम चिन्तन तो होगा
भावनाओं को शब्दों का
वस्त्र पहनाना आसान है
पर कठिन है
आँखों में आँखे डालकर
ये कहना
अकेले मैं तुम ही
मेरे सबसे करीब थे
निशब्द है आज सारी जुबान
Monday, July 20, 2020
पहली बरसात की बूंद
गिरते ही माटी की
गंध हो तुम
पक्षीयो के कलरव के बीच
मोर की पीहू पीहू हो तुम
सांझ होते ही मंदिर की
झालर धण्टा ध्वनि हो तुम
तपती धूप में माथे की सलवटो में
पडी़ पसीने की बूंद हो तुम
पत्तो से छन कर धरा पर गिरने वाली
रोशनी की पहली किरण हो तुम
मासूम चेहरे पर उभरते सवालों का
जवाब हो तुम
अब मैं और क्या कहूूूं
मेरे पास शब्द नहीं है
बहुत लाजवाब हो तुम...
सम्बन्धों का स्पर्श
💐अनुभवी संदेश💐 💐💐💐💐💐💐 एक युवा युगल के पड़ोस में एक वरिष्ठ नागरिक युगल रहते थे , जिनमे पति की आयु लगभग अस्सी वर्ष थी , और ...
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अक्सर अजनबी से प्यार होता क्यों है; इंकार करने पर चाहत का इकरार होता क्यों है; पाना नहीं तकदीर में शायद; फिर भी हर मोड़ पे उसी क...
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अक्सर मेरे अंतर्मन में यही प्रश्न घूमता रहता है ?आखिर प्रेम क्या है? क्या यह एक दिवास्वप्न है ?या फिर एक अंतहीन यात्रा है ?जिसमें पड़ाव के र...
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💐अनुभवी संदेश💐 💐💐💐💐💐💐 एक युवा युगल के पड़ोस में एक वरिष्ठ नागरिक युगल रहते थे , जिनमे पति की आयु लगभग अस्सी वर्ष थी , और ...